रस – परिभाषा, भेद, प्रकार, उदाहरण

आज हम इस लेख में जानेंगे की रस किसे कहते है एवं इसके प्रकार कितने है। रस का तात्पर्य आनंद की अनुभूति से है, किसी भी काव्य को पढने व सुनने मे जो हमें आनंद की अनुभूति होती है वह रस कहलाता है। हिंदी व्याकरण में रस को काव्य की आत्मा माना जाता है।  

हमारे पढने व लिखने के अनुसार तो रस एक ही होती है लेकिन व्याकरण के अनुसार रस को कई अनेक भागों में बांटा गया है। इसलिए हमें रस क्या है इसे समझना चाहिए। आज का हमारा यह लेख आपको इस के बारे में अच्छे से समझायेगा की रस क्या है एवं इसके कितने प्रकार होते है। 

रस क्या है  एवं इसके प्रकार के बारे में इस लेख में आपको पूरी जानकारी देने का प्रयास करेंगे। हम उम्मीद करते है की आपको हमारा ये लेख पसंद आएगा। जब हम बचपन में स्कूल में पढते थे तब से ही व्याकरण के बारे में पढते आ रहे है। 

इसके बावजूद भी ऐसे कई बिंदु है जो हमें रस व व्याकरण के संदर्भ में समझ नही आते है। हमारे इसी लेख में उन्ही बिन्दुओं को समझाने का प्रयास कर रहे है। चलिये जानते है की रस क्या है और इसके कितने प्रकार है –

रस की परिभाषा

रस का शाब्दिक अर्थ होता है ‘‘ आनंद की अनुभूति ’’। किसी भी शब्द, वाक्य, या काव्य को सुनने के बाद हमे जो आनंद की अनुभूति होती है उसे ही रस की संज्ञा दी जाती है। हमारे भारत के प्राचीन साहित्य में रस की काफी ज्यादा प्रधानता थी एवं काव्य में इसे काफी महत्व दिया जाता था। 

रस के भेद

हिन्दी व्याकरण में रस को मुख्य रूप से 4 भागों में बांटा गया है। 

विभाव रस 

विभाव रस की श्रेणी में ऐसी अनुभूति को रखा जाता है जिसमें पदार्थ व बाह्य विकार से अन्य व्यक्तियों के हृदय में भावोद्रेक होता है। दूसरे शब्दों मे कहा जाए तो स्थायी भाव का उद्बोधन करना ही विभाव रस कहलाता है। विभाव रस को पुनः 2 भागों में बांटा गया है। 

  • आलंबन विभाव – ऐसे रस जिसमें भाव को प्रभाव देने के लिए किसी अन्य भाव का सहारा लेना होता है। ऐसे रस को हिंदी में आलंबन विभाव रस कहा जाता है। जैसे नायक – नायिका 
  • उद्यीपन विभाव – इस श्रेणी में उन रस के प्रकारों को रखा जाता है जिनमें कोई स्थिति देख कर मन प्रफुल्लित होता है या भावपूर्ण होता है। जैसे चांदनी, कोकिल इत्यादि। 

अनुभाव रस

सामान्य शब्दों में कहा जाये तो मन के भाव यानी मनोभाव को व्यक्त करने वाले रस को अनुभाव रस कहा जाता है। अनुभाव रसों को पुनः 8 भागों में विभाजित किया गया है। 

  1. स्तंभ 
  2. स्वेद 
  3. रोमांच 
  4. स्वर-भंग 
  5. कम्प 
  6. विवर्णता (रंगहीनता) 
  7. अश्रु 
  8. प्रलय (संज्ञाहीनता/निश्चेष्टता) ।

व्यभिचारी या संचारी भाव

ऐसे भाव जो मन में संचरण करते है उन्हे, संचारी भाव कहते है। व्यभिचारी एवं संचारी भाव सभी इस स्थायी भावों के सहायक होते है। यह भाव अनुकुल व परिस्थितियों के अनुसार घटते रहते है। इन भावों को पुन 4 भागों में बांटा गया है जो इस प्रकार है – 

  • देश काल एवं व्यवस्था 
  • उत्तम, मध्यम और अद्यम व्यवस्था 
  • आश्रय की अपनी प्रकृति 
  • स्त्री व पुरुष दोनों के अपने अपने स्वभाव

हिन्दी व्याकरण में संचारी भावों की संख्या 33 मानी गई है जो निम्न है – 

  1. हर्ष 
  2. विषाद 
  3. त्रास (भय/व्यग्रता) 
  4. लज्जा (ब्रीड़ा) 
  5. ग्लानि 
  6. चिंता 
  7. शंका 
  8. असूया 
  9. अमर्ष (विरोधी का अपकार करने की अक्षमता से उत्पत्र दुःख) 
  10. मोह 
  11. गर्व 
  12. उत्सुकता 
  13. उग्रता 
  14. चपलता 
  15. दीनता 
  16. जड़ता
  17. आवेग 
  18. निर्वेद (अपने को कोसना या धिक्कारना) 
  19. घृति (इच्छाओं की पूर्ति, चित्त की चंचलता का अभाव) 
  20. मति 
  21. बिबोध (चैतन्य लाभ)
  22. वितर्क 
  23. श्रम
  24. आलस्य 
  25. निद्रा
  26. स्वप्न
  27. स्मृति 
  28. मद 
  29. उन्माद
  30. अवहित्था (हर्ष आदि भावों को छिपाना) 
  31. अपस्मार (मूर्च्छा)
  32. व्याधि (रोग) मरण

हिन्दी व्याकरण में यह सब संचारी भाव है जो उपर बताये गये है। 

स्थायी भाव 

ऐसे भाव जो मन से उत्पत्र होते है एवं हमेशा एक ही समान होते है उन्हे मन विकार यानी भाव कहा जाता है। नाट्यशास्त्र नामक ग्रंथ में स्थानी भावों की कुल संख्या 11 बताई है। वे ग्यारह भाव निम्न है जो इस प्रकार है – 

  1. रति,
  2. ह्रास 
  3. शोक 
  4. क्रोध 
  5. उत्साह 
  6. भय 
  7. जुगुप्साध्घृणा 
  8. विस्मयध्आश्चर्य 
  9. शमध्निर्वेद
  10. वात्सल्य रति 
  11. भगवद विषयक रतिध्अनुराग

इस सब भावों के अलावा रस के यह 11 भाव और होते है जो निम्न है – \

हिन्दी रस में इन ग्यारह रस को मुख्य माना गया है। यह रस मख्य है। 

  1. श्रृंगार रस 
  2. हास्य रस
  3. करूण रस 
  4. वीर रस 
  5. रौद्र रस 
  6. भयानक रस 
  7. वीभत्स रस 
  8. अद्भुद रस 
  9. शांत रस 
  10. वत्सल रस 
  11. भक्ति रस

रस से संबंधित कुछ तथ्य 

  1. श्रृंगार रस का एक नाम ‘‘ भक्ति रस / रसपति ’’ भी है। 
  2. नाटक में कुछ 8 रसों को लिस्ट किया गया है जो मुख्य है। 
  3. प्राचीन काल में भरत मुनि ने केवल 8 रसों की ही रचना की थी, उसके बाद यह समय के साथ बढते गये। 

रस के कुछ उदाहरण

  • लंगूर के हाथ में अंगूर
  • तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप,
  • साज मिले पंद्रह मिनट, घंटा भर आलाप।
  • घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता,
  • धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी)
  • सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
  • खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत।।
  • गीध जांघि को खोदि-खोदि कै मांस उपारत।
  • स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।। (भारतेन्दु)

निष्कर्ष

यहाँ हमने रस क्या है एवं उसके सभी प्रकारों की जानकारी दी है, अगर आपको हमारा यह आर्टिकल अच्छा लगा है तो अपने दोस्तों के साथ शेयर जरुर करें। अगर शब्द से जुड़ा किसी भी तरह का प्रश्न है तो आप यहाँ कमेंट बॉक्स में पूछ सकते हैं। हमें उम्मीद है की आप हमारा यह मेहनत भरा लेख अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करेंगे।

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